भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ बड़ौदा पर जुर्माना लगाया

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नई दिल्ली : भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग (सीसीआई) ने केमिस्‍ट्स एंड ड्रगिस्‍ट्स एसोसिएशन ऑफ बड़ौदा को प्रतिस्‍पर्धा अधिनियम, 2002 (अधिनियम) के प्रावधानों का उल्‍लंघन करते हुए पाया। एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार आयोग (एमआरटीपीसी) के समक्ष वर्ष 2009 में एक शिकायत/जानकारी दायर की गई। जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि सीडीएबी प्रतिबंधात्‍मक व्‍यापार व्‍यवहार में लिप्‍त है। यह आरोप थे कि सीडीएबी अपने व्‍यवहार के माध्‍यम से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) को अनिवार्य बनाकर ड्रग्‍स और दवा‍इयों की आपूर्ति को सीमित और नियंत्रित कर रहा है। ऐसा स्‍टॉकिस्‍ट की नियुक्ति और दवाई कंपनियों द्वारा बाजार में नये उत्‍पादों को प्रस्‍तुत करने से पहले उत्‍पाद सूचना सेवा (पीआईएस) के भुगतान से पहले एनओसी जारी करके किया जा रहा है। इसके अलावा ये भी आरोप थे कि सीडीएबी थोक बिक्रेताओं और खुदरा बिक्रेताओं के लिए व्‍यापार मुनाफे निर्धारित कर रहा था। बाद में यह मामला अधिनियम की धारा 66(6) के प्रावधानों के तहत एमआरटीपीसी ने आयोग को स्‍थानांतरित कर दिया था। आयोग ने प्रथम दृष्‍टया मत के बाद  महानिदेशक (डीजी) के कार्यालय को इस मामले में जांच करने का निर्देश दिया।


महानिदेशक ने जांच-पड़ताल के बाद सीडीएबी पर प्रावधानों का उल्‍लंघन करने का दोष स्‍थापित किया। विस्‍तृत जांच-पड़ताल के बाद आयोग ने 5-9-2012 को एक आदेश पारित किया जिसमें यह उल्‍लेख किया गया कि सीडीएबी अनिवार्य एनओसी की जरूरत को थोप रहा था। इसके अलावा एआईओसीडी में उल्लिखित मानदंडों को लागू करके थोक/खुदरा बिक्रेताओं के लिए मुनाफा भी तय कर रहा था। इसे अधिनियम की धारा 3(1) के साथ पठित धारा 3(3)(ए) और 3(3)(बी) के प्रावधानों का उल्‍लंघन करते हुए पाया। तदनुसार आयोग ने अधिनियम की धारा 27 के तहत दिए गए निर्देशों के स्‍थगन और निवृत्ति के अलावा आर्थिक जुर्माना भी लगाया है।


सीडीएबी द्वारा दायर अपील के अनुपालन में पूर्ववर्ती सीओएमपीएटी ने अपने आदेश दिनांक 18-11-2016 द्वारा आयोग के दिनांक 5-9-2012 के आदेश को प्रक्रियात्‍मक मुद्दे के आधार पर रद्द कर दिया और मामले को नये सिरे से न्‍यायिक निर्णय के लिए आयोग के पास वापस भेज दिया।


तदनुसार इस मामले को नये सिरे से माना गया। सीडीएबी को विभिन्‍न गवाहों के साथ जिरह करने का एक अवसर प्रदान करने के बाद आयोग ने सभी पक्षों को अपने लिखित निवेदन दायर करने की अनुमति दी और मामले में विस्‍तृत सुनवाई आयोजित की। रिकार्ड पर उपलब्‍ध सामग्री के आधार पर आयोग ने यह पाया कि सीडीएबी दवाई कंपनियों द्वारा नये स्‍टॉकिस्‍टों की नियुक्ति से पूर्व एनओसी की अनिवार्यता पर जोर देते हुए प्रतिस्‍पर्धात्‍मक निरोधी कार्य में लिप्‍त था और संबंधित समया‍वधि के दौरान अधिनियम की धारा 3(1) के साथ पठित धारा 3(3)(ए) और 3(3)(बी) के प्रावधानों का उल्‍लंघन करते हुए व्‍यापार मुनाफा निर्धारित कर रहा था। तदुनसार सीडीएबी को उपरोक्‍त प्रतिस्‍पर्धा निरोधी कार्य को रोकने और निवृत्‍त रहने का निर्देश दिया। आयोग ने अधिनियम की धारा 27 के प्रावधानों के अधीन संबंधित अवधि के लिए सीडीएबी की औसत संबंधित आय के 10 प्रतिशत के आधार पर गणना किया गया 32,724 रुपये का आर्थिक दंड लागू किया।