कांग्रेस के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह


कांग्रेस पार्टी के अंदर जिस तरह अध्यक्ष के चयन को लेकर मंथन चलता दिख रहा था, उससे कुछ समय के लिए यह भ्रम अवश्य पैदा हुआ कि शायद इस बार कोई नया नाम निकलकर सामने आए। राहुल गांधी ने 25 मई की कार्यसमिति से इस्तीफा देते समय स्पष्ट कर दिया था कि उनके परिवार से कोई अध्यक्ष नहीं होगा। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से जब सोनिया गांधी एवं राहुल दोनों बाहर निकल गए तो लगा कि वाकई इस बार परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति के पार्टी की कमान संभालने की संभावना बन रही हैइसमें सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाने का पहला निष्कर्ष यही है कि ये कवायदें केवल औपचारिकता थीं। परिवार से जुड़े और उसके वरदहस्त के कारण शीर्ष नेतृत्व में शुमार प्रमुख नेताओं के समूह ने मन बना लिया था कि बाहर का कोई अध्यक्ष नहीं हो सकता। जो सूचना है कि 10 अगस्त को 5 भागों में अलग-अलग क्षेत्रवार बैठकों के बाद शाम को दोबारा कार्यसमिति की बैठक में फिर राहुल से इस्तीफे पर पुनर्विचार का आग्रह किया गया। इस पर पार्टी महासचिव प्रियंका वाड्रा ने बताया कि वे इसके लिए तैयार नहीं हैं।


इसके तुरंत बाद सबसे पहले पी. चिदंबरम ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने का सुझाव रखा, जो मिनटों में गुलाम नबी आजाद, चिदंबरम, आनंद शर्मा और मनमोहन सिंह का सम्मिलित प्रस्ताव बन गया। इसके विरुद्ध कौन जा सकता था? सभी सदस्यों ने इस पर मुहर लगा दी, तो 2 वर्ष बाद फिर अध्यक्ष की जिम्मेवारी घूमकर सोनिया के कंधों पर आ गई हैबैठक के बाद रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कांग्रेस महाधिवेशन में नियमित अध्यक्ष के चुनाव तक वे पार्टी की बागडोर संभालेंगी, हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि महाधिवेशन कब होगा? ढाई महीने की कसरत के बाद यदि पार्टी, अस्वस्थता के कारण स्वयं को औपचारिक जिम्मेवारी से मुक्त करने वाली सोनिया की शरण में ही जाने को विवश है तो इसके मायने कांग्रेस की दृष्टि से अत्यंत ही चिंताजनक हैं। कांग्रेस इस समय अपने जीवनकाल के सबसे गंभीर संकट और चुनौतियों का सामना कर रही है।


गहराई से विचार करें तो उसके सामने राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी पार्टी के रूप में अपने अस्तित्व बनाए रखने का संकट है। यह एक दिन में पैदा नहीं हुआ है। 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस 44 स्थानों तक जब सिमटी तो उस समय सोनिया गांधी ही अध्यक्ष थीं। अगर कांग्रेस उस समय ईमानदारी से पराजय के कारणों का गहन विश्लेषण करती तो उसे नरेन्द्र मोदी के आविर्भाव से आलोड़ित होते समाज तथा तेजी से बदलते भारत के सामूहिक मनोविज्ञान और उसके समक्ष अपनी सारी कमजोरियों का अहसास से आलोड़ित होते समाज तथा तेजी से बदलते भारत के सामूहिक मनोविज्ञान और उसके समक्ष अपनी सारी कमजोरियों का अहसास हो जाता। एके एंटनी की अध्यक्षता में गठित समिति ने जगह-जगह जाकर समझने की कोशिश की और एक रिपोर्ट सोनिया गांधी को दी। वह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं हुई। हालांकि कांग्रेस के हीनेता बताते हैं कि राहुल गांधी ने अपने अनुसार उस रिपोर्ट को आधार पर बदलाव किया। किंतु उस समय समिति के दौरों के दौरान आ रही खबरों को याद किया जाए तो अनेक स्थानों पर नेताओं-कार्यकर्ताओं ने सोनिया एवं राहुल दोनों के नेतृत्व पर प्रश्न उठाए थे।


सच कहा जाए तो 2019 का चुनाव परिणाम 2014 का ही विस्तार था। कांग्रेस इसलिए सन्निपात की अवस्था में आ गई, क्योंकि उसे राजनीति में होते पैराडाइम शिफ्ट यानी प्रतिमानात्मक परिवर्तन का अहसास हुआ ही नहीं। राहुल गांधी और सोनिया गांधी को उनके रणनीतिकारों ने बता दिया कि मोदी सरकार जा रही हैऔर कांग्रेस 180 से ज्यादा सीटें जीतेगी। अगर राहुल गांधी कहते हैं कि हमें पराजय के लिए अनेक लोगों को जिम्मेवार ठहराना है। इसलिए अध्यक्ष नहीं रह सकते तो क्या उसमें सोनिया गांधी शामिल नहीं हैं? 2019 में हम खंडहर में परिणत होती जिस कांग्रेस को देख रहे हैं, उसके लिए किसी दोषी माना जाएगा? अगर नरसिंहराव के कार्यकाल को छोड़ दें तो पिछले 4 दशकों में नेहरू-इंदिरा परिवार ही पार्टी का सर्वोच्च नीति-निर्धारक रहा है, भले ही औपचारिक तौर पर उसके हाथों नेतृत्व रहा हो या नहीं। स्वयं सोनिया गांधी मार्च 1998 से 2017 तक अध्यक्ष रहीं।