नेहरू विज्ञान केंद्र द्वारा आयोजित वेबिनार में योग के विज्ञान और दर्शन पर प्रकाश डाला गया


नई दिल्ली : योग मनुष्य और प्रकृति के बीच क्रिया, संयम, पूर्ति और सद्भाव के माध्यम से मन और शरीर की एकता का प्रस्तुतीकरण है। यह स्वास्थ्य और कल्याण के प्रति एक समग्र दृष्‍टिकोण है। इन बातों को, डॉ दीपिका कोठारी ने पहले योग-सूत्र- 'अथा योगा अनुशासनम्' के बारे में बताते हुए कहा। 18 जून, 2020, गुरुवार को नेहरू विज्ञान केंद्र (एनएससी) द्वारा आयोजित वेबिनार में हिस्सा लेते हुए, योग शोधकर्ता ने इस प्राचीन विद्या के महत्व को समझाया, जिसका महत्व ऐसे समय में बढ़ गया है जब दुनिया कोविड-19 महामारी से लड़ रही है। वेबिनार की अन्य वक्ता, डॉ. राजवी मेहता, अयंगर योगाश्रया की प्रतिपादक, भारत की प्राचीन मंदिर कला और वास्तुकला में पाए जाने वाले योग के प्रतीकवाद को चिन्हित किया। चर्चाओं का संचालन, एनएससी के निदेशक, श्री शिवप्रसाद खेनेड द्वारा किया गया।


डॉ कोठारी ने योग की ऐतिहासिकता पर प्रकाश डाला, उन्होंने इसकी शुरूआत पतंजलि से की, जिसने इस विज्ञान को संकलित, कूटबद्ध और व्यवस्थित किया, जिसको आज 'योग सूत्र' के नाम से जाना जाता है। विशुद्धि फिल्म्स के बैनर तले बनी उनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'हिस्ट्री ऑफ योगा- द पाथ ऑफ माई एन्सेस्टर्स' में 6,000 वर्षों के दौरान योग के विकास के बारे में पता लगाया गया है। इस फिल्म की समाप्ति उस समय होती है जब स्वामी विवेकानंद इसे पश्चिम में लेकर जाते हैं और वैज्ञानिक व्याख्यान खोजते हैं। योग शोधकर्ता बताते हैं कि योग शास्त्र हिंदू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सूफीवाद और अन्य विभिन्न सिद्धांतों की धार्मिक मान्यताओं में एक साथ मिला हुआ है।


डॉ कोठारी बताती हैं कि ऋग्वेद, जिसे दुनिया का सबसे प्राचीन साहित्य माना जाता है, द्वारा योग सूत्र के दो महत्वपूर्ण पहलुओं- 'तप' और 'ध्यान' को स्पष्ट किया गया है। 'तप' का मतलब है अस्थिर मन और संवेदी अंगों को नियंत्रित करना क्योंकि यह रचनात्मकता और ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य के साथ काम करता है, जबकि 'ध्यान' ज्ञान प्राप्ति के लिए एक उपकरण के रूप में कार्य करता है। यह बताते हुए कि प्राचीन काल में किस प्रकार के ज्ञान की तलाश थी, डॉ. कोठारी बताती हैं कि ज्ञान यह जानने के लिए है कि मैं कौन हूं और बाहरी दुनिया क्या है, अर्थात वास्तविकता क्या है। योग सूत्र में एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द 'संयम' है, जो कि प्रत्याहार (इंद्रियों की निर्लिप्तता), धारणा (एकाग्रता) और ध्यान (चिंतन) के संयोजन का प्रतीक है- जो आसपास और अंदर की चीजों के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरण हैं। इसलिए, यह प्रभावी रूप से मानव शरीर को कार्य करने और ज्ञान प्राप्ति कराने वाला एक उपकरण है। पतंजलि ने भी ‘यम’और ’नियम’ के दो पहलुओं के बारे में लिखा है, जो मानव कोशिकाओं को मजबूत करने में मदद करते हैं और इस प्रकार से वे हमें दिन-प्रतिदिन के जीवन में आत्म-अनुशासन में रहने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।


योग शोधकर्ता के विचार के अनुसार, भारतीय संस्कृति में गहराई से प्रतिपादित किए गए इन योग उपकरणों ने वर्तमान समय में ज्यादा महत्व प्राप्त किया है क्योंकि यह वर्तमान महामारी से प्रभावित संकट से लड़ने में मदद करता है। आगे व्याख्या देते हुए, उन्होंने कहा कि “वर्तमान में चल रहे कोरोनावायरस महामारी को ध्यान में रखते हुए, हमने एक दूसरे से दूरी बना रखी है। भारतीय संस्कृति में एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने की प्रथा हमेशा से चली आ रही है इसके विपरित पश्चिमी देशों में एक-दूसरे को गले लगाना और आलिंगन करना बहुत आम बात है। भारत में, आदिकाल से ही एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने की यह प्रथा ‘यमों’ और‘ नियमों’ को दृष्टांत करता है। इसी प्रकार, महामारी के दौरान 'शौच'/ 'सुचिता' (स्वच्छता) एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू हैं।"


योग शास्त्र और भारत की प्रथम सभ्यता- सिंधु घाटी की शहरी आबादी, के बीच संबंधों को स्पष्ट करते हुए योग विद्वान ने कहा - सिंधु घाटी के नियोजित और व्यवस्थित शहरी जीवन में लोग शायद ही कभी बीमार हुए होंगे। इन बातों की पुष्टि इस बात से होती है कि सिंधु घाटी स्थलों की खुदाई में किसी भी रोगग्रस्त कंकाल का पता नहीं चल सका है। हमारे जीवन में उन दिनों से कुछ प्रथाएं चली आ रही हैं, जैसे कि प्रत्येक दिन साफ-सफाई और धुलाई, सत्विक भोजन आदि।


डॉ कोठारी ने कहा कि हम भारतीय अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में, 'यम' और 'नियम' का अभ्यास करते हैं, इस संदर्भ में जागृत हुए बिना। डॉ कोठारी को लगता है कि, "थोड़े और समर्पित प्रयास के साथ, हम पाँच यमों और पाँच नियमों का अभ्यास करके अपनी क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं।" डॉ कोठारी के अनुसार, वायरस प्रेरित महामारी के अलावा भ्रष्टाचार एक अन्य नकारात्मकता है जो कि वर्तमान समाज को सामान्य रूप से बीमार कर रही है।


प्राचीन काल से ही भारत में भ्रमण करते रहे पश्चिम और मध्य-पूर्व के विदेशी यात्रियों के ऐतिहासिक दस्तावेजों में यह दर्ज है कि सभी वर्गों के भारतीय लोग, बहुत ही सच्चे, भरोसेमंद और ईमानदार रहे हैं। योगाचार्य अयंगर के अनुसार, जब भारत विदेशी आक्रमण और घुसपैठ का शिकार हुआ तब योगी और सिद्ध पुरूष जंगलों की ओर पलायन कर गए और आम जनता से उनका संबंध टूट गया। इसके कारण सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई और आम लोगों द्वारा अपनाए जा रहे उच्च मूल्यों का धीरे-धीरे क्षरण हो गया, जिसके कारण देश में भ्रष्टाचार और नकारात्मकता उत्पन्न हो गई। गुरु-शिष्य परम्परा, जो एक उच्च पद पर आसीन था और जिसने समाज में उच्च मूल्यों को बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर योगदान दिया, धीरे-धीरे विकृत होता गया और मूल्यों की समाप्ति का कारण बना।


डॉ राजवी मेहता का मानना है कि इन कठिन समय में आशा की एक किरण, हमारे पास विरासत में मिली ज्ञान और जीवन शैली के प्रति हमारी श्रद्धा में निहित है, जो बहुत हद तक इसके द्वारा निर्देशित भी है। आज, 100 से ज्यादा देशों में योग का अभ्यास किया जाता है। बीकेएस अयंगर जैसे योग गुरुओं ने विश्व नागरिकों को पिछली शताब्दी से योग के चमत्कारों से अवगत कराया है। डॉ मेहता का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में अपने संयुक्त राष्ट्र महासभा के भाषण में इसका प्रस्ताव रखने और संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में अवलोकन करने के बाद, लोगों में योग के प्रति विश्वास और श्रद्धा की बहाली हुई है, जो कि औपनिवेशिक वर्षों के बाद में नीचे की ओर खिसक गया था।


वैश्विक नागरिकों, विशेष रूप से पश्चिमी देशों के लोगों, को प्राचीन भारतीय कला के प्रति आकर्षित होने के संदर्भ में बोलते हुए, डॉ मेहता कहती हैं कि उन्होंने सबसे पहले योग आसन सीखना शुरू किया जिससे उन्हें बहुत फायदा हुआ। इसके बाद इसने उन्हें योग शास्त्र की गहरी समझ हासिल करने के लिए अपनी ओर आकर्षित किया, जो भारतीय संस्कृति में गहराई से समाहित एक दर्शन है। योग प्रतिपादक ने कहा कि भारतीय कला और वास्तुकला में योगासनों या 'आसनों' को चित्रित किया गया है। डॉ मेहता कहती हैं कि लॉकडाउन के संदर्भ में, जहां पर महामारी को नियंत्रित करने और इसके वक्र को समतल करने की आवश्यकता रही है, योग का अभ्यास करके लोगों को लाभ प्राप्त हुआ है जो मन को बाहरी आकर्षणों से दूर करने और ध्यान को अंदर की ओर केंद्रित करने में मदद करता है।


डॉ मेहता ने बताया कि शरीर और मन के संतुलन और संरेखण को बनाए रखने में योग का बहुत बड़ा योगदान है। भगवद् गीता में कहा गया है कि- योग संतुलन है और पतंजलि ने बताया है कि 'योग चेतना के उतार-चढ़ाव का संयम है'। पतंजलि योगाश्रया की डॉ. राजवी मेहता ने कुछ योगासनों (आसन) का उल्लेख किया है, जो इस कठिन समय में रोग के प्रकोप से निपटने में सहायक हैं। तड़ासन (सिर, गला और मूलाधार के केंद्र को एक सीध में रखते हुए स्थिर मन, आंखों और चेतन को ध्यान के लिए), हलासन, मयूरासन और वशिष्ठासन उन आसनों में से हैं जिनका दिमाग और शरीर को शांत करने में बहुत प्रभाव पड़ता है। इसलिए मारीचासन करना चाहिए, जो शरीर का एक अनोखा मोड़ है, शायद ही किसी व्यायाम में ऐसा रूप पाया जाता है और जो न केवल रीढ़ का व्यायाम करता है, बल्कि श्वसन, हृदय, पाचन और उत्सर्जन प्रणालियों पर भी प्रभाव डालता है। मूलाबंधासन, परिपूर्ण मत्स्येन्द्रासन, बद्ध कोणासन, गर्भ पिंडासन, पद्मासन एकसमान रूप से दिमाग और शरीर को स्वस्थ करते हैं। इन्हें संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद के विज्ञान केंद्र द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में दर्शाया गया। इस वेबिनार को नीचे क्लिक करके देखा जा सकता है।